वर्तमान परिवेश में दलित साहित्य । प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन से बातचीत

श्यौराज सिंह बेचैन

श्यौराज सिंह बेचैन का लेखन हिंदी दलित साहित्यिक परिदृश्य में एक मील का पत्थर है। शोषण, गरीबी, अशिक्षा, जातिवाद और भेदभाव के शिकार दलितों के संघर्ष उनकी कहानियों के केंद्र में हैं। उनके कथा सृजन में उन शोषणकारी ताकतों की रूपरेखा तैयार की गई है जिनके परिणामस्वरूप दलितों को सामाजिक अधिकारों से वंचित किया गया और हाशिए पर रखा गया। ‘भरोसे की बहन’, मेरा बचपन मेरे कन्धों पर (आत्मकथा), चमार की चाय, क्रौंच हूँ मैं, नयी फसल (कविता संग्रह), ‘मेरी प्रिय कहानियां’ उनके उनकी कुछ उल्लेखनीय रचनायें हैं। पुरस्कार/सम्मान: इण्टरनेशनल लिटररी अवार्ड-यू.एस.ए. (थर्ड अम्बेडकर इण्टरनेशनल कॉन्फ्रेंस, पेरिस में); सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान; साहित्य भूषण सम्मान, उ.प्र. हिन्दी संस्थान लखनऊ; बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर सम्मान महू-संस्थान म.प्र.; कबीर सेवा सम्मान, स्वामी अछूतानन्द अति विशिष्ट सम्मान उ. प्र.; डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अवार्ड दिल्ली, नेशनल अम्बेडकर अवार्ड (भा.द.सा. अकादमी, दिल्ली) 2014; मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का कृति केन्द्रित प्रथम पुरस्कार। आइए पढ़िए वर्तमान परिवेश को संदर्भ में रखकर दलित साहित्य के विषय पर श्यौराज सिंह बेचैन जी से की गयी युवा अध्येता उज्ज्वल शुक्ला और आँचल सिंह की बातचीत।

प्रश्न 1 : वर्तमान परिवेश में दलित साहित्य को साहित्य की मुख्य धारा की तुलना में आप कहाँ देखते हैं? क्या जाति लोकतांत्रिकरण के आड़े आ रही है ?

मुख्यधारा एक जातीय वर्चस्व का प्रतीक है। जातिभेद संविधान ने हटाया, परंतु समाज में है, साहित्य में है। अम्बेडकरी साहित्य में लोकचेतना है। हिंदी पत्रिकाएं जाति स्वरूप की हैं। वह साहित्य में मुख्य भूमिका नहीं निभा रही हैं, फिर भी वह मुख्यधारा है। सत्यतः साहित्य की कोई मुख्यधारा किसी भी युग और किसी भी देश में वही हो सकती है, जो अधिक से अधिक पीड़ित, वंचित एवं संघर्षशील लोगों की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करती है।

विगत कुछ वर्षों से ‘जाति न पूछो साधु की’ की तर्ज़ पर हमारे आदरणीय लेखक, पत्रकार यह आग्रह कर रहे हैं कि लेखक को साधु मान लो, उसकी जाति मत पूछो। वह लेखक अपनी क्रिया-कलापों में जाति प्रकट कर रहा है। मैं यहाँ डॉ. अम्बेडकर को नहीं दोहराऊँगा। राहुल सांकृत्यायन का उद्धृत करूंगा – जातीयता आखिर कहाँ हैं ? लोगों की सामाजिक दुनिया अपनी जाति तक सीमित है। जब एक खास जाति का आदमी बड़े पद पर पहुँचता है, तो नौकरी दिलाने, सिफारिश करने या दूसरे तौर से सबसे पहले अपनी जाति के आदमी को फायदा पहुँचाता है । 

अगर मैं यह कहूँ कि दलित साहित्य ही मुख्यधारा है तो यह तथाकथित मुख्यधारा के ठेकेदारों को बर्दाश्त नहीं होगा। इसलिए मैं यह कहूँगा कि एक वर्ण साहित्य की मुख्यधारा है और एक दलित साहित्य की। साहित्य में ये समांतर धाराएं चल रही हैं।

लोकतंत्र में चाहे विचार की धारा हो, सृजन की धारा हो, सामाजिक जीवन शैली की धारा हो, उसमें यह आवश्यक नहीं है कि सब एक जैसी हों, उनमें विविधता होगी और उनमें हर एक की अपनी-अपनी विशेषता होगी। ठीक इसी तरह दलित साहित्य अपनी विशेषताओं और पृथकताओं के साथ हर विधा में अग्रसर है।

प्रश्न 2:  जिस तरह दलित लेखकों ने अपनी उपस्थति दर्ज कराने हेतु महाराष्ट्र में दलित पैंथर आंदोलन की तीव्रता का इस्तेमाल किया था, क्या पुनः उसी तरह के आयोजन की ज़रूरत आजकल भी महसूस होती है ?

जब बाबा साहब बहिष्कृत भारत के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, तब उस समय भी स्वामी अछूतानंद जैसे लेखक मौजूद थे, जिन्होंने बाबा साहब के समर्थन में 500 चिट्ठियाँ जगह-जगह से टेलीग्राम करायीं थीं। स्वामी जी कवि, नाटककार, संपादक थे और प्रेमचंद के समकालीन थे। तब अपने हिंदी क्षेत्र में काम हो रहा था, पंजाब में बाबू मंगूराय के नेतृत्व में तथा आंध्र में भी यह हो रहा था। यहाँ के अपने नेता थे, जिनके नेतृत्व में दलित साहित्य रचा जा रहा था । 

‘दलित पैंथर’ पर ‘ब्लैक पैंथर’ का असर था। उसकी शैली थोड़ी उग्र थी। हालाँकि महाराष्ट्र में साहित्य का वह तेवर हमेशा नहीं रहा, फिर भी था। उन्हें लगता था कि उनकी आवाज कमजोर थी, अतः कोई सुनता नहीं था। इधर हिंदी क्षेत्र में मध्यकाल में संत रैदास और कबीर आदि वर्ण व्यवस्था का विरोध कर रहे थे। ये आंदोलन साहित्य के माध्यम से हो रहा था।

मूल बात यह है कि आंदोलन की जरूरत है या नहीं है। आंदोलन, क्रांति और संघर्ष की जरूरत है। उसके बगैर कुछ होगा भी नहीं। आंदोलन के लिए लोगों को त्याग करना पड़ेगा। अगर आप अपने तुच्छ प्रलोभनों को त्याग नहीं सकते, तो आप समाज को कुछ दे भी नहीं सकते। स्वामी अछूतानंद ने जगह-जगह 200 सम्मेलन किए थे। वह भारी विपन्नता के समय भी काम करते रहे। राजनीति में जाने का प्रलोभन छोड़ा। एक रात अपने किसी मित्र के घर जाते हैं और माँगते कि कुछ रूखी-सूखी रोटी हो दे दीजिए, उन्हें मनाही भी मिलती है, तो ऐसे त्यागी लोगों को आगे आने की जरूरत है ।

प्रश्न 3: आज से 20 वर्ष पहले जो दलित साहित्य था वो आज नहीं है, क्या तब से आज में कुछ परिवर्तन देखने को मिलता है ? साथ ही आज से 20 वर्ष बाद दलित साहित्य और जीवन को आप किस प्रकार देखते हैं ?

आप जब स्वयं मान रहे हैं कि जो साहित्य बीस साल पहले था वह आज नहीं है तो जाहिर है कि समय के साथ जरूरतें और चेतना के विकास क्रम के साथ साहित्य बदल रहा है विकसित हो रहा है । साहित्य को फैलने-पसरने के लिए पत्र पत्रिकाएं और प्रोत्साहन देने वाली संस्थाएं चाहिए, उसे पाठक और शोधकर्ता चाहिए तभी साहित्य आगे बढ़ेगा। कुछ भी दलितों के पास नहीं था। एक बार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी कहानी भेजी और अखबार के संपादक ने दस साल के लिए रख ली और लिखा अगर और धैर्य हो तो रख सकते हो। अब कोई कितने समय तक इंतजार कर सकता है, छपने का।

दलित साहित्य के पास प्रचार माध्यमों का अभाव था। बाबा साहब अंबेडकर के विचार भी नष्ट हो जाते अगर उन्होंने अपने अखबार न निकाले होते। एक समय ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी किताबें दलित साहित्य अकादमी के आयोजन में फुटपाथ पर किताबें रख कर बेंच रहें थे और कँवल भारती ने उनसे पूछा था कि यह ‘सदियों के संताप’ का लेखक कहाँ मिलेगा ? 1990 की परिस्थितियाँ ऐसी बदली कि उस वक्त जातियों के आरक्षण और सम्मान की बात खड़ी हो गई, उस वक्त बाबा साहब डॉ. अंबेडकर को ‘भारत रत्न’ मिला और मण्डल और कमंडल की राजनीति शुरू हुई। पहली बार 1992 में ओमप्रकाश वाल्मीकि पर शोध शुरू हुआ। उसके पहले कहा जाता रहा कि दलित साहित्य पर सामग्री उपलब्ध नहीं है। शोध कहाँ से कराएँ ? उस वक्त के परिवर्तनों की वजह से वह सामने आए।

प्रश्न 4: जिन्हें आप बड़े-बड़े दलित बताते हैं अछूतानन्द इत्यादि, उन्हें कोई नहीं जानता ऐसा क्यों है ?

हाल ही में एक अखबार में टिप्पणी छपती है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि को उनके गाँव के लोग नहीं जानते। मेरा प्रश्न है कि क्या हमारे देश की साहित्य अकादमी ओमप्रकाश वाल्मीकि को जानती है ? जो वर्तमान हालात हैं हमारे देश के शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में वो अच्छे नहीं हैं। खासकर दलितों को लेकर, क्योंकि जो गरीब मजदूर, किसान, दलित सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे थे, दस-पंद्रह सालों से उनका ध्वस्तिकरण कर दिया गया। अतः आगामी 20 वर्षों के दौरान एक बार अत्याचार की हद बढ़ेगी और पुनः जागरूक लोगों के आगे आने पर हालात बदलेंगे । 

प्रश्न 5: सवर्णों द्वारा लिखे गए गंभीर और वैचारिक दृष्टिकोण से मजबूत दलित लेखन को आप मान्यता किस आधार पर देंगे ?

गैर-दलितों के वैचारिक दृष्टिकोण से मजबूत लेखन से आपका क्या मतलब है मैं समझा नहीं। पर वह जैसा भी है अपनी जगह है। वह दलितों का दृष्टिकोण नहीं है। मेरा मानना है कि विचारों और लेखन की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। इस लिए हर वैचारिक रूप से लिखे गए साहित्य का सम्मान है। परंतु लेखन और अनुभव में अंतर होता है। जो इसे महसूस करके लिखता है उसके लेखन में जो पीड़ा, जो तकलीफ है वह बिना उसे भोगे शब्दों में नहीं आ सकती ।

जहाँ तक सवाल मान्यता देने का है। सो उनकी सत्ता है साहित्य में, शिक्षा में, मीडिया में। उन्हें मेरी क्या दरकार ? वे पत्रिकाएं निकाल रहें हैं, पाठ्यक्रम बना रहे हैं, ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी ले दे रहे हैं। दलित लेखन कबीरी फकीरी के अंदाज में लिखे जा रहे हैं।

प्रश्न 6: आप आज के युवा वर्ग जो हैं, उन्हें कैसा साहित्य पढ़ने का सुझाव देंगे ?

ऐसा साहित्य जिसे पढ़ कर युवा जिम्मेदार बनें, संवेदनशील बनें, लोकतान्त्रिक ढंग से सभ्य और समता, स्वतंत्रता और बंधुता के मूल्यों को आत्मसात करने वाले बनें। देश के कमजोर सामाजिक हिस्सों का सशक्तिकरण का सामूहिक रूप में उन्नत हुए देशों की तरह गरीबी मुक्त, अविद्या मुक्त शोषक और बंधुआगिरी मुक्त भारत बनाने में तन मन लगा सके।

प्रश्न 7: आपकी आत्मकथा के देशी-विदेशी भाषों में अनुवाद हुए, हर विश्वविद्यालय में उसकी चर्चा है, वह पाठ्यक्रम में है, शोध प्रबंधों का विषय है, आपको व्यक्तिगत रूप से कैसी प्रतिक्रियाएं मिलती हैं ?

मेरी आत्मकथा पढ़ने के बाद मेरे पास बहुत खत आते हैं। एक विद्यार्थी का खत आया जिसकी पढ़ाई लगभग छूटने वाली थी लेकिन उसे मेरी आत्मकथा से प्रेरणा मिलती है और वह आगे पढ़ने के लिए प्रेरित हुआ। तो हर ऐसा साहित्य जो आपको प्रेरित करे जो आपको एक बेहतर मनुष्य बनाए, आप पढ़ें। 

प्रश्न 8: आप पहचान को लेकर बहुत चिंतित दिखाई पड़ते हैं, सम्बोधन के लिए कई नाम अगर हैं जैसे हरिजन जो गांधी जी ने दिया, एस सी एस टी जो संविधान ने दिया, दलित जो साहित्य ने दिया, आप अपने लिए कौन सा सम्बोधन पसंद करते हैं ?

जब तक देश में एक भी व्यक्ति के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार होता है मैं अपने आप को अछूत श्यौराज कहलाना पसंद करूंगा। इसलिए कि मेरे आजाद मुल्क में गुलामीसूचक सम्बोधन वजूद में है, इसलिए कि अस्पृश्यता अस्तित्व में है।

साक्षात्कार कर्ता: उज्ज्वल शुक्ला, आँचल सिंह