अक्करमाशी । शरणकुमार लिंबाले । पुस्तक समीक्षा

अक्करमाशी

प्रकाशन वर्ष – १९८४ ( 1984 ) अनुवाद – सूर्यनारायण रणसुभे  भोगे हुए यथार्थ के दुःख की नींव में हमेशा एक चिंगारी होती है। यह चिंगारी दो मुही है, जो अगर अभिव्यक्त न हो पाए तो भीतर ही भीतर पीड़ित को भस्म कर देती है और यदि अपनी उचित दिशा पा जाए तो सृजन का …

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