तुम्हारा दुःख और मैं । देवांश दीक्षित

प्रेम पर कुछ और कविताएँ

तुम्हारी आँख से ढलका आँसूपृथ्वी पर गिरते ही बन गयाहरसिंगार का फ़ूल मैं यह देख उत्सुक होताया तुम्हारी वेदना पर मूककभी इसका सटीक निर्णय ना कर सका तुम किसी अव्यक्त दुःख कीजीती जागती मूर्ति निकलीजिसने किसी संबल कीकभी माँग नही की आँखों की नमी कोमुस्कुराहट की लौ में दीप्त करनामैंने तुमसे सीखा कितनी बहादुर हो …

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