प्रेम

तुम्हारा दुःख और मैं । देवांश दीक्षित

प्रेम पर कुछ और कविताएँ

तुम्हारी आँख से ढलका आँसूपृथ्वी पर गिरते ही बन गयाहरसिंगार का फ़ूल मैं यह देख उत्सुक होताया तुम्हारी वेदना पर मूककभी इसका सटीक निर्णय ना कर सका तुम किसी अव्यक्त दुःख कीजीती जागती मूर्ति निकलीजिसने किसी संबल कीकभी माँग नही की आँखों की नमी कोमुस्कुराहट की लौ में दीप्त करनामैंने तुमसे सीखा कितनी बहादुर हो …

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तुम्हारे लिए मेरा प्रेम

प्रेम | Artwork by Sunita

दृश्य है जो, वो थोड़ा-सा है
अदृश्य का आसमान बहुत बड़ा होता है
कितना कुछ है जो देखा नहीं गया
कितना कुछ है जो देखा नहीं जा सकता
इसी न देखे जा सकने वाले
शब्दों में न बाँधे जा सकने वाले
अदृश्य एहसासों में से मेरा प्रेम है

गैलेक्सी के छोर पर खड़े होकर तुम से प्रेम करने का कारण ढूंढना तारों की गिनती करने जैसा है

galaxy

पृथ्वी सौरमंडल की यात्रा पर है
सूर्य आकाशगंगा की यात्रा पर है
गैलेक्सी अनंत अंतरिक्ष की यात्रा पर है
गैलेक्सी के छोर पर खड़े होकर
तुम से प्रेम करने का कारण ढूंढना
तारों की गिनती करने जैसा है
तुमसे प्रेम ‘अकारण’ की यात्रा है