अनुराग अनंत की कविता ‘महामारी के दिनों में’

महामारी के दिनों में

एक मैं कहाँ हूँ इन दिनों पूछोगे, तो बता नहीं पाऊँगा आँखों के नीचे जमता जा रहा है जागी हुई रातों का मलबा सिर में सुलगते रहते हैं न जाने कैसे-कैसे ख़याल छत से देखता रहता हूँ गंगा के किनारे जलती हुई चिताएँ एक मौन है, जहाँ मैं हूँ या नहींठीक-ठीक कह नहीं सकता एक चीख़ है, जिसके दोनों सिरों …

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