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देवांश दीक्षित की कहानी – वो

पारिजात के फूल बहुत पसंद हैं उसे, जिन्हें लगभग रोज ही तोड़कर खोंस लेती है वो कनखियों से छुआते हुए अपने कानों पर। बिखरे हुए बालों संग, वो घुल जाती है दोपहरी की सांय-सांय में, मानो शिव बटालवी के बिरहा का कोई फ़कीर हो।