अनुराग अनंत की कविता – सलीका

पहाड़ चढ़ने का भी सलीक़ा है और उतरने का भीकिसी को भुलाते हुए यदि सावधानी न बरती जाएतो भुलाना याद करना बन जाता हैजीवन को अगर सलीक़े से न जिया जाएतो जीवन से जीवन जाता रहता हैजैसे देह से जाते रहते हैं प्राण किसी को बुलाओ तो ध्यान रहे आवाज़ में चुम्बक रहेलोहा-दिल लोग भी …

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