तुम्हारा दुःख और मैं । देवांश दीक्षित

प्रेम पर कुछ और कविताएँ
Plum Trees in Blossom by Camille Pissarro, 1894

तुम्हारी आँख से ढलका आँसू
पृथ्वी पर गिरते ही बन गया
हरसिंगार का फ़ूल

मैं यह देख उत्सुक होता
या तुम्हारी वेदना पर मूक
कभी इसका सटीक निर्णय ना कर सका

तुम किसी अव्यक्त दुःख की
जीती जागती मूर्ति निकली
जिसने किसी संबल की
कभी माँग नही की

आँखों की नमी को
मुस्कुराहट की लौ में दीप्त करना
मैंने तुमसे सीखा

कितनी बहादुर हो तुम !
अपनी कविताओं में लिखती हो
तुम्हें प्रेम रूपी बारिश से भय लगता है

और इसके बावजूद
प्रेम की पहाड़ी के मध्य स्थित ज्वालामुखी में
पुनः विलीन हो जाती हो

यह दृश्य देख
किसी उत्साहित दर्शक की तरह
मेरा हृदय सराहना में पीटता है तालियाँ।

जैसे ग्रह नही अलग हो सकते
उनके मध्य उपजे गुरुत्वाकर्षण से
शायद उसी तरह मनुष्य नही
अलग हो सकता प्रेम से

प्रेम हमारा गुरुत्व है
जीवन की हरीतिमा की ओर खींचता हुआ

और तुम इस वक्तव्य का
सबसे सुंदर उदाहरण ।

किसी दूजे के प्रेम प्रसंग पर
तुम्हारी आँखों से बहे हैं हर्ष के अश्रु

किसी और के विरह पर तुम विचलित हुई हो
पूरी आत्मीयता के संग

इस दुनिया में जहाँ हर कोई
अपने-अपने सुखों के बंदर बाट में लगा है

वहाँ तुम अन्य के दुःखों में
हिस्सा लेती हो किसी तृप्ति की तरह

भौतिक वाद की भौंडी प्रतिस्पर्धा से बाहर
अपनी संवेदनाओं की आभा लिए खड़ी हो तुम

क्या तुम जानती हो ?
तुम्हारे आगे के दो दांतों के मध्य
उस छोटी सी जगह से उदय होता है चंद्रमा
जो बिखर जाता है अंधेरों में अपनी चाँदनी लिए

किसलिए करती हो दुःख का पोषण ?
जीवन समुद्र में मुझ जैसे पथिक के लिए
एक लाइट हाउस हो तुम

अजब अभागा हूँ जो तुमसे
तुम्हारे होने के सौभाग्य को
कभी व्यक्त नही कर पाता

हर बार
हर जगह
हर भेंट पर
मुझे डंक सा डसता है
तुम्हें एक शिला सा देखना

तुम्हारी आँखों के पीछे
गरजते वेदना के बादलों को
बरसने से रोक न पाना एक त्रासदी है

तुम एक यात्रा हो
जिससे होकर ही गुज़रेगा जीवन
जिसे प्रेम आएगा ढूँढने खोज की तरह
मानों अपने अस्तित्व पर भरोसा और तटस्थ करने

प्रेम संजोएगा तुम्हें
अलौकिक उपलब्धि की तरह,

और छुपा लेगा क्षितिज में
घुलती हुई सूर्य की लालिमा सा।

देवांश दीक्षित


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